Friday, October 18, 2013

हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है -सतीश सक्सेना

हमेशा ही अभावों में सभी ने व्यस्त पाया है ! 
मुसीबत में सदा सबने हमें आश्वस्त पाया है !

हमें कुछ भी नहीं उम्मीद, ऐसे वक्त में तुमसे  !
ज़रुरत में, हमेशा ही तुम्हें, ऋणग्रस्त पाया है !


जरा सी चोट में कैसे ये आंसू छलछला उठे 
हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

अभी तो कोशिशें करते हैं, सबसे दूर रहने की !
भरोसा ही सदा हमने,यहाँ क्षतिग्रस्त पाया है !


मुफलिसी में भी,मेरे द्वार से खाली न जाओगे
हमें लोगों ने खस्ता हाल में विश्वस्त पाया है !

20 comments:

  1. बहुत अच्‍छी रचना है।

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  2. बहुत खूबसूरत गज़ल है आपकी...
    बधाई मित्र...

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  3. गहराई कम बता कर डुबाया है :)

    बहुत खूब !

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  4. अजब हालात है यारों अब इस दुनिया का
    जिन्हें भामाशाह समझा उन्हें लाचार पाया है

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  5. तुम्हारी चोट से ऐसे,कदम क्यों लडखडाये है
    हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

    चोट कोई भी हो पहले तो वाकई कदम लड़खड़ाते है लेकिन चोटे मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारती भी है इसलिए चोट देने वाले मेरे ख्याल से बधाई की पात्र है ! बहुत सुन्दर शेर है सभी !

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  6. सुन्दर रचना
    हमें दर्द का अभ्यस्त पाया —गालिब साहेब ने लिखा—मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गई
    गैर तो गैर थे अपनों का सहारा न हुआ
    तूफानों में मस्त रहना — तुम्ही घबराये बाधा से तो बाधा कौन टालेगा— तुम्हारे हाथ गर कांपे तो बत्ती कौन बालेगा।
    दूर रहने की कोशिश गालिब साहब भी करते रहे और यहां तक कह दिया — पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार और अगर मर जाइये तो नौहाख्वां कोई न हो
    और अन्तिम ' सच्चा दोस्त वही जो 'उसकी' जरुरत पर
    हमारे पास आये।

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  7. वाह वाह …… हिंदी के शब्दों के बखूबी इस्तेमाल किया है आपने..... शानदार

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  8. धूमिल का लिखा याद आ गया।... मैंने हरेक को आवाज़ दी है, हरेक का दरवाजा खटखटाया है मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ उठायी है उसको मादा पाया है। ---धूमिल।

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  9. दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होता नहीं
    है हथेली खून से अब तरबतर कोई सुनता नहीं

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  10. सुंदर रचना के लिये ब्लौग प्रसारण की ओर से शुभकामनाएं...
    आप की ये खूबसूरत रचना आने वाले शनीवार यानी 19/10/2013 को ब्लौग प्रसारण पर भी लिंक की गयी है...

    सूचनार्थ।

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  11. भरोसा भी क्षतिग्रस्त.. वाह! बहुत कुछ कहता है..

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  12. भला कैसे भरोसा कर लें हम सब कुछ भला होगा।
    कि जब सरकार के इकबाल का रवि अस्त पाया है॥

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  13. तुम्हारी चोट से ऐसे,कदम क्यों लडखडाये है
    हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

    ................. बहुत सुन्दर शेर

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  14. ये तो आपने सही कहा कि जब भी किसी की बहुत जरुरत पड़ी है ...वो कभी साथ खड़ा नहीं मिला

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  15. सुन्दर शब्द,खूबसूरत भाव--उम्दा।

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- सतीश सक्सेना

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