Tuesday, October 29, 2013

जिसको लेखक समझा हमने,यह केवल हरकारा है - सतीश सक्सेना

कितने पुरस्कार सर धुनते,ज्ञान ध्यान से मारा है ,
हिंदी के गुरुघंटालों ने , आँगन खूब बुहारा है !

कर्णधार हिंदी के बन कर, मस्ती सुरा, सुंदरी में,
भावभंगिमा और आँखों से चलता साहूकारा है !


विद्वानों का रूप देखकर , हमको ऐसा लगता है !
जिसको ज्ञानी हमने माना वो केवल हरकारा है !

पहली बार मिले हैं तुमसे,ज़रा सांस तो लेने दो ! 
जल्दी ज्ञान कहाँ समझेंगे, आदत से बंजारा हैं !

धीरे धीरे समझ सकेंगे, इंसानों की फितरत को !
हमने सारा जीवन अपना,पशुओं साथ गुज़ारा है!

24 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  2. sunder,samyik......bahut achchi lagi......

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  3. इंसानों के साथ जीवन बिताने के बाद समाजः आता है की पशु ही अच्छे थे ...
    लाजवाब ... लाजवाब ... लाजवाब ...

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  5. बेहतरीन ,
    व्यंग नहीं सच्चाई है
    ट्यूशन की गज़ब कमाई है
    नई पोस्ट " अश्रु मेरे दृग तेरे थे "

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  6. साहित्य का हरकारा :)
    क्या खूब कही सर आपने ............लाजबाब :)

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  7. सुन्दर कटाक्ष । बधाई ।

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  8. धीरे धीरे समझ सकेंगे , इंसानों की फितरत को !
    हमने सारा जीवन अपना,पशुओं साथ गुज़ारा है
    आजकल भरोसे लायक ईमानदार यही प्राणी है :)

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  9. धीरे धीरे समझ सकेंगे , इंसानों की फितरत को !
    हमने सारा जीवन अपना,पशुओं साथ गुज़ारा है ,,,

    बहुत सुंदर लाजबाब गजल ,,,

    RECENT POST -: तुलसी बिन सून लगे अंगना

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  10. किस मोहल्ले में रह रहे हैं भाई ,बदल डालिये -ऐसे कब तक चलेगा ?कोई अच्छा सा पास पड़ोस तलाशिये न! :-)

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  11. कर्णधार , हिंदी के बन कर, तैरे सुरा, सुंदरी में !
    हिन्दी की तेरहवीं करा के,खुद करते भंडारा हैं !

    @@ जोरदार

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  12. क्या खींच के मारा है :)

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  13. वाह! क्या बात है...

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  14. .
    .
    .
    ... :)

    बढ़िया... आजकल आपकी रचनात्मकता पूरे उफान पर चल रही है... थोड़ा स्लो डाउन करिये सर जी... सांस भी लेने देंगे कि नहीं हम गरीबों को....


    ...

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  15. सच है आज लेखक समझने की भूल सभी से होती है।

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  16. वाह, क्या कुरेदा है, मर्म पर।

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  17. बहुत शानदार भंडारा करवाया, इसी के लायक हैं ये.

    रामराम.

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  18. बन्धु ! विद्वानों की सभा में कई बार हमें भी ऐसा ही लगता है कि इन्हें सेरिब्रल डायरिया हो गया है । उनके चरित्र हमें आसमां से ज़मीं पर ला देते हैं ।

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- सतीश सक्सेना

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