Sunday, March 21, 2010

यमुना मैय्या मैली सी !

दिल्ली में यमुना एक नाले के रूप में बहती है , आर्ट ऑफ़ लिविंग  के द्वारा १७ मार्च से एक सामूहिक  प्रयास शुरू किया गया है , बहुत प्रसंशनीय कार्य मानते हुए लोगों ने इसमें योगदान किया है  ! "मेरी दिल्ली मेरी यमुना " अभियान में बिसिनेस स्कूल और अन्य कालेज के विद्यार्थी बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते देखे गए यह एक अच्छा शकुन है !
अगर यमुना के आस पास रहने वाले लोग ही, कमर कस कर निकल पड़ें तो मुझे विश्वास है कि हमारे माथे लगा यह गन्दा टीका साफ़ होते देर नहीं लगेगी !    

Saturday, March 20, 2010

जवान कैसे रहें -१ - सतीश सक्सेना

जीवन का हर क्षण अमूल्य है, जीवन में हर क्षण का मज़ा लें ,ख़ास तौर पर उस समय और भी जब कोई अन्य आपको कष्ट देना चाह रहा हो ! मैंने अपने जीवन का कमाया धन 7० % अपने बच्चों पर, 2० % अपनों की अथवा जरूरत मंदों की मदद पर और १० % सिर्फ अपने ऊपर खर्च किया जिससे मैं अपने आपको खुश रख सकूं ! मुझे पूरा विश्वास है कि अगर मैं सानन्द हूँ तो मेरे आश्रित भी सुखी रह पायेंगे !
बचपन से मेरे पसंद का एक शेर नज़र है ...

"उम्रेदराज़ मांग के लाये थे चार दिन 
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में "

आप अपनी जिन्दगी ऐसे  न कटने दें. वाकई में हम लोग दो चार दिन ही मांग के लाये हैं , हर दिन के, हर क्षण को, हँसते हुए और मस्ती में निकालें ,चाहे कितना ही अभाव ही क्यों न हो , रोते  समय भी हंसने का बहाना ढूँढ लें  !

बचपन से याद, गोपालदास नीरज की  यह पंक्तियाँ मेरी पसंदीदा लाइनें रहीं हैं  !
"जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो मना
उन मुश्किलों  में  मुस्कराना,  धर्म है !
जब हाथ से टूटे न,  अपनी हथकड़ी 
तब मांग लो ताकत स्वयं जंजीर से 
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी 
उस दम  हंसी ले लो किसी तस्वीर से 
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो 
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है !"

उपरोक्त रचना मैंने हमेशा  गुरु मंत्र मान कर कंठस्थ किया और उसका पालन किया  ! आज भी मेरे मित्र मुझ ( सही उम्र नहीं बताऊंगा ) ३० साल के जवान को देख कर आश्चर्य चकित होते हैं !
और हाँ मैं वाकई जवान हूँ ....

Tuesday, March 16, 2010

बेटियों का प्यार !


मेर्रे गीत पर,  आदरणीय बृजमोहन श्रीवास्तव  के कमेंट्स पढ़कर की बोर्ड  से, उँगलियाँ हटाकर, निढाल सा हो गया ,
बेटी शायद मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है  !

"प्रिय सतीश -यह अनुभव ले पूरी तरह सिद्ध है कि बेटियां माँ बाप को ज्यादा चाहती है ,पुत्र तो शादी के बाद बदल भी जाता है किन्तु बेटी को शादी के बाद भी माँ बाप की चिंता सताती रहती है | इसका कारण है बचपन से ही पुत्र का कार्यक्षेत्र बाहर और बेटी का घर के अन्दर होता है |बेटी देखती है घर कैसे चलाया जा रहा है ,माँ को क्या क्या परेशानी हो रही है ,पिता कितने कष्ट सहन कर अल्प आय में घर चला रहा है ,उनके प्रति प्रेम व् सहानुभूति उसके मानस में अंकित हो जाती है बेटा इन सब से बेखबर रहता है"
एक एक शब्द लगता है हर घर की कहानी है , कितने भारी  मन से  विदा होकर "अपने घर" जाती है हमारी बिटिया  "अपना घर" छोड़ कर ! उसका अपना घर विवाह के दिन से ही "मायका " बन जाता है और घर के लोग, घर से बेटी को भेज अक्सर गंगा नहाने जाते हैं , एक  जिम्मेवारी से मुक्ति मिली , और नए घोंसले में यह बच्ची अपनी जगह बनाने के प्रयास में एक नयी शक्ति से लग जाती है ! 
सारे जीवन यह बच्ची "अपने घर" की याद आते ही तड़प उठती है , त्यौहार और मायके में हुए उत्सव के अवसरों पर, अक्सर भाई या पिता के संदेशे का इंतज़ार करती रहती है , कि  शायद इस बार माँ किसी को भेज पाए ! 
और अक्सर माँ -बाप , अपने व्यस्त बेटे -बहू के सामने, अपने आपको असहाय सा महसूस करते हैं.....

Friday, March 12, 2010

प्रणय निवेदन - I - सतीश सक्सेना

बरसों पूर्व लिखा गया यह एक लयबद्ध प्रेमपत्र, युवाओं को समर्पित है  !

प्रथम प्यार का प्रथम पत्र 
है, भेज रहा मृगनयनी को !
उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में 
अर्पित, प्रणय संगिनी को !
इस आशा के साथ कि
समझें तड़प हमारे प्यार की !
प्रेयसि पहली बार लिख रहा, चिट्ठी तुमको प्यार की  !

अक्षर बन के जनम लिया 

है मेरे दिल के,भावों  ने !
दबे हुए, जो बरसों से थे 
लिखा उन्हीं  अंगारों ने !
शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , 
भाषा  ह्रदयोदगार  की  !
झुकी नज़र को इक पन्ने पर, भेंट हमारे प्यार की !

तुम्हे दृष्टि भर  जिस दिन 
देखा था सतरंगी रंगों में,
भूल गया मैं , रंग पुराने
भरे हुए थे ,  यादों  में !
उसी समय से,पढनी सीखी , 
गीता अपने,  प्यार की  !
प्रियतम पहली बार गा रहा, मधुर रागिनी प्यार की !

मुझे याद वे शब्द तुम्हारे
ह्रदय पटल पर लिखे हुए 
दुनिया वालों की नज़रों से
कब के दिल में छिपे हुए 
निज मन की बतलाऊं कैसे 
बाते हैं , अहसास की !
न जाने क्यों आज उठ रही, तड़प हमारे प्यार की !

अगला भाग पढ़ने के लिए प्रणय निवेदन - II पर क्लिक करें !

Saturday, March 6, 2010

भारत माँ के ये मुस्लिम बच्चे - सरवत जमाल !- सतीश सक्सेना

"मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन 
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ 

मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख 
सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ "

यह लफ्ज़ हैं ,५३ वर्षीय  सरवत एम् जमाल  के , जो उन्होंने अपने ब्लाग सरवत इंडिया पर लिखे नए लेख "होली ....ग़ज़ल " में व्यक्त किये हैं  ! यह दर्द उन्हें हमारे ही एक देश वासी  ने होली की मुबारकबाद भेजते समय अनजाने  में दे दिया ! शायद  
  • उन्हें अंदाजा ही नहीं होगा कि  उनके इन शब्दों से एक संवेदन शील दिल को कितनी तकलीफ होगी  कि वे शायद होली ही न खेल पायें !
  •  उन्हें शायद यह भी नहीं पता  होगा कि सरवत जमाल  ही नहीं इस देश में लाखो अल्पसंख्यक  अपने अन्य मित्रों के साथ ठीक वैसे ही  उत्साह से होली खेलते हैं जैसे हम .
  • उन्हें शायद यह भी नहीं पता होगा कि सरवत जमाल के घर में भी होली वैसे ही खेली जाती है जैसे उनके घर में !
  • उन्हें शायद यह भी  नहीं  पता होगा कि सरवत जमाल और उनकी धर्म पत्नी श्रीमती अलका मिश्रा  इस बार होली नहीं मना पाए  ! 
  • उन्हें शायद यह भी नहीं अंदाजा होगा कि इस परिवार की यह होली , इन शुभचिंतक के " आप भी तो भारतीय हैं ....."  जैसे शब्दवाण की भेंट चढ़ चुकी है !  
एक मूर्ख और ह्रदयहीन व्यक्ति के द्वारा जाने अनजाने में कहे गए कडवे बोल किसी संवेदनशील  ह्रदय को छलनी कर सकते हैं , और ह्रदयहीन लोगों को इसका अहसास तक नहीं होता  अफ़सोस तब होता है जब संवेदनशीलता की दम भरते हम भारतीय  इस पर चुप्पी साध जाते हैं  !

बेचारे सरवत जमाल इस पर और क्या कहें ....उनकी  ही ग़ज़ल की दो लाइनें  दे रहा हूँ ....

"आपकी आंखों में नमी भर दी !
बेगुनाहों ने मर के हद कर दी
...........
और बेटी का बाप क्या करता
अपनी पगडी तो पाँव में धर दी

Thursday, March 4, 2010

मेरे जीवित रहते हुए भी ......- सतीश सक्सेना

                    क्या आपने कभी यह सोचा है कि हमने अपने जीवन में कहाँ कहाँ गलतियाँ की है, अगर हम ईमानदारी से विगत जीवन का मूल्यांकन करें तो लगता है कि जीवन में कुछ भूलें बेहद बड़ी थीं , जो माफ़ करने लायक नहीं थीं और शायद इस समय भी अपनी आदतों में कोई सुधार नहीं कर पाया हूँ  !  मन  यह मानने को तैयार नहीं होता कि मेरी भयंकर भूलें, मात्र लापरवाही थी या जानबूझकर अपने आपको अन्य कार्यों में व्यस्त रखना ताकि मैं इस समस्या से बचा भी रहूँ एवं अपने आपको भविष्य में दोषी भी न ठहराऊं ! 
मेरी इन भूलों अथवा लापरवाहियों के कारण, वे लोग असमय ही दुनिया से चले गए जिन्होंने मेरे बचपन में , सदा मेरी रक्षा की थी ,.....
मुझे लगता है कि ...
  • मैंने अपने बड़ों की, उनके जीवनकाल में, वह सेवा नहीं की जिसके वे हकदार थे और उनके अवसान के बाद पछतावा किया कि जो सुविधाएँ मैं उन्हें आराम से दे सकता था वह सिर्फ लापरवाही के कारण नहीं दे सका !
  • मैं उनकी घातक बीमारी के समय में, अगर ठीक प्रकार उनके इलाज़ का प्रबंध करता तो वे शायद आज भी जीवित होते, ठीक अगर यही लापरवाही उन्होंने मेरे बचपन में की गयी होती तो शायद मैं आज यह लेख लिखने को जिन्दा न होता !
  • निस्संदेह वे हमसे बहुत अच्छे थे ! 

Tuesday, March 2, 2010

"ब्लाग जगत और सम्मान सुरक्षा" में आपकी आवाज चाहिए - सतीश सक्सेना

अपने लिखे हुए को पढ़ पढ़ कर जो आत्म मुग्धता पिछले ५-६ वर्षों में हुई है , वह बिना भोजन १०-१५ साल जिन्दा रखने की एनर्जी ,और अपने चाटुकारों के साथ ,शरीफ लोगों का मज़ाक उड़ाने की  पर्याप्त ताकत दे सकती है ऐसा ब्लाग जगत में  आसानी से देखा और महसूस किया जा सकता है !  


अच्छे आदमी की पहचान, उसके कार्यों से अथवा सोच  से होती है , और अक्सर रंगे सियार वक्त के साथ पहचान लिए जाते हैं और उस समय भी ये अपने कार्यप्रणाली पर पछतावा न करके, केवल अपनी पुरानी राज सत्ता और किये गए कुछ उल्लेखनीय कार्यों का हवाला देते देखे जाते हैं ! 


यहाँ कुछ मदारी बढ़िया कपडे पहनकर,बिना पढ़े, किताबी संकलन के आधार पर, पहली द्रष्टि में लोगों को प्रभावित करने और पर्याप्त भीड़ इकट्ठी करने में  कामयाब हैं  ऐसे मदारियों की सख्त आवश्यकता, इन ब्लाग नायकों को हमेशा रहती है जिनको शुरू के दिनों, (कालोनी बसने के समय ) से २०-३० लोगों के मध्य वाहवाही की आदत पड़ गयी हो ! ब्लाग जगत में शांत स्वभाव से कार्य करने का अर्थ, अक्सर यह अति उत्साही ब्लागर उसकी कमजोरी मान लेते हैं और उसके कार्यों  का मखौल उड़ाकर, अपने प्रति भीड़ को आकर्षित करने का प्रयास करते रहते हैं ! नपुंसक दर्शकों के मध्य अधिकतर यह काम और भी आसान हो जाता है , प्रतिकार और प्रतिरोध न होने  के कारण सज्जनों का अपमान और दुर्जन महिमा मंडित होता देखना आम है  ! 

अफ़सोस यह है कि यह कार्य वरिष्ठ ब्लागर अपने अनुयायियों के बल पर कर रहे हैं और प्रतिकार किये जाने पर , प्रतिकारी पर चोट करने के लिए इन चेलों के साथ साथ कई बार महागुरु को भी आकर पब्लिक में यह कहना पड़ता है कि उनके प्रिय ब्लागर ने कुछ नहीं किया केवल प्रतिकारी ही उत्पाती है और उसके महान और विद्वान् शिष्य  को बुरा बता कर, सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाह रहा है ! इस प्रकार के चरित्र हनन में, नवोदित और निर्दोष  ब्लागरों  की शक्ति का सफलता पूर्वक दुरूपयोग किया जा रहा है !   


मुझे एक ऐसी ही घटना याद आ रही है जिसमें शांत स्वभावी अजीत वडनेरकर के साथ घटी थी और उसका किसी ने कोई प्रतिकार  नहीं किया था  ! अगर यह परंपरा ख़त्म नहीं की गयी तो कल आपके साथ भी यही घटना घटेगी और दोष आप भी तमाशबीनों को देंगे ! अतः हर हालत में आपको भीड़ से आगे आना  पड़ेगा ! किसी शायर की निम्नलिखित  इन अफसोसजनक पंक्तियों के दोषी हम सब समान रूप से ही हैं ...
साहिल के तमाशाई , हर डूबने वाले पर  ,
अफ़सोस तो करते हैं ,इमदाद नहीं करते 


घटिया लोगों को महिमा मंडित करने का प्रयास नहीं होना चाहिए  और अगर तथाकथित अच्छे लोग भी यह प्रयास करते हैं तो यह सिर्फ  इन महानायकों द्वारा, अपनी सुरक्षा  के लिए गुंडे पालने जैसा ही है ! अगर गुरु ही असुरक्षा में जी रहे हैं तो वे लोगों को क्यां बांटेंगे ? कई बार सुवेषित बन्दर को , अनजाने में अथवा जल्दवाजी में    आदर्श मान लेने की भूल ,का प्रायश्चित्त करने में महीनो लगते हैं ! और धीर गंभीर लोगों के मध्य जग हंसाई होती है सो अलग ! मगर शरीफ अनुयायिओं को जब तक अपनी भूल का पाता चलता है तब तक यह गुरु लोग अपना उल्लू साध चुके होते हैं !

मजेदारी यह है कि यह गुरु शिष्य , रक्षक और रक्षित दोनों ही कायर हैं , और  एक दुसरे को क्रीम पाउडर लगाकर ही, एक दुसरे का कद ऊँचा करने  में हमेशा प्रयास रत रहते हैं  ! 

Sunday, February 28, 2010

पुत्री का प्यार -सतीश सक्सेना

                   पुत्रवधू की तलाश में बहुत से परिवारों के संपर्क में आता रहा हूँ , लोग फ़ोन करके अपनी पुत्री के बारे में
कम और अपने उच्च पदस्थ पुत्र की उच्च शिक्षा, और मासिक आय का उल्लेख अवश्य करते  ! मैं यह जानकर स्तब्ध रह जाता कि  जहाँ पुत्र एक अच्छे संस्थान से बी टेक करके सोफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत है वहीं पुत्री की शिक्षा साधारण रखी गयी है ! कारण हम अपनी बेटी को बाहर नहीं भेजना चाहते आदि आदि !


                 मैनें अपने कुछ दोस्तों से बातचीत की  जिनके घर में भी लड़के को इंजिनियर और पुत्री  का लक्ष्य टीचर बनाने का था कारण  लडकी की शादी के लिए पैसे इकट्ठे करना ,या तो शादी कर लो या पढ़ा लो जैसे तर्क थे ! बहू के लिए जहाँ जेवर खरीदने  का प्रावधान था वहीं बेटी के लिए जेवर पर कोई पैसा नहीं क्योंकि वह तो उसकी ससुराल  से ही आता है तो हम क्यों करें ??


                 एक पिता के नाते मेरे लिए यह सब जानना बड़ा दर्दनाक है ,और उससे भी अधिक तकलीफदेह है , आसपास और परिवार के लोगों का उपरोक्त व्यवस्था का ही साथ देना और उसमें रक्त के रिश्ते भी शामिल हैं ! अपनी बेटी के हर जन्मदिन पर  दिए  गए आभूषणों पर उसकी माँ का अधिकार रहेगा क्योंकि वे उन आभूषणों  को  बेटी की शादी के बाद, उसे अन्य मौकों, अवसरों आदि पर ही देना चाहती हैं  न कि शादी से पहले ही उसे दे दिए जाएँ ! 


                  मुझे लगता है कहीं न कहीं हम सब धोखेबाज़ हैं एक तरफ हम बेटे से भविष्य की उम्मीद की आशा करते हुए उसे सब कुछ देते हैं वहीं घर में सबसे कमज़ोर, अपनी ही जाई को सिर्फ शादी करके, अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं ,यह इस सबसे प्यारी और मासूम, जो कि जीवन भर अपने पिता और भाई के मुंह को देखती रहती है , के प्रति नाइंसाफी  है  !   

Friday, February 26, 2010

आओ तुमको गले लगा लें - सतीश सक्सेना

इस उत्सव में ,रंगों में डूब कर वसंत का स्वागत करते हैं हम लोग ! पूरा परिवार ही रंगों में सराबोर होकर कुछ समय के लिए जैसे मस्ती में डूब जाता है  ! इस ख़ूबसूरत मौके पर लगभग हर इंसान का, दुश्मनों से भी गले मिलने की इच्छा पैदा हो जाती है ! एक बार अपने अन्दर झांक कर देखो ,दिल टटोल कर देखो एक आवाज आती है ...


भूले -भटके उन  अपनों  के , 
कैसे  दरवाजे ,   खुलवाएं ?
मन में रंजिश पाल के बैठे 
कैसे अब उनको समझाएं ?
इस होली पर क्यों न सुलगते 
दिल के, ये अंगार बुझा दें !
बचपन के दिन याद करें,और आयें हंसकर गले लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई 
ईर्ष्या के पौधे उग आये !
रोते  गाते , हम दोनों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियो 
आओ रंग गुलाल लगा लें !
भूलें उन कडवी बातों को , अपना भी घर -बार सजा लें !

बरसों बीते  तांडव  करते  ,
कितनी रात जागते काटी
भूल गए साँसे गिनती  की ,
सारी उम्र गुजरती जाती ! 
क्यों न नयी उम्मीदें लेकर,
फिर से घर को स्वर्ग बनालें !
इस होली पर  रंग विरंगे,मिलकर वन्दनवार  लगा लें !

कितने  वर्षों से , शीशे  के ,
सम्मुख आकर मुग्ध हुए हैं 
कितनी बार मस्त होकर के
अपने यश पर मस्त हुए हैं ! 
इस होली पर नशा भुलाके,
इन चरणों में शीश झुकालें !
प्यार और मस्ती  में  डूबें, दिल से  अहंकार  जला दें  !

Thursday, February 18, 2010

भीड़ इकट्ठी करने का नया नुस्खा -सतीश सक्सेना


I have gone thru your ... Kundli and made 2 predictions (see attchment)
With Regards
Dr J.S. Arora
General Secretary
National Thalassemia Welfare Society &
Federation of Indian Thalassemics
KG-1/97 Vikas puri
New Delhi 110018
Ph. 91-11-25507483, 09311166711
URL: www.thalassemiaindia.org
E Mail;- drjsarora@bol.net.in
drjsarora@gmail.com

धर्मभीरु लोगों  की भावनाओं का फायदा उठाते हुए उन्हें भ्रगु संहिता जैसी दैवीय भविष्यवानियों से विस्मित कर, उनकी शरण में आने का कार्य कराना, कितना आसान हो गया है, समाज में अच्छे भले सम्मानित लोग भी यह कार्य करते हैं यह जान कर मैं खुद अचंभित रह गया ! 
उपरोक्त मेल मुझे आज मिली, जिसे पढ़ कर स्पाम में डालते डालते डॉ जे एस अरोरा का पूरा पता और वेब साईट देख कर विश्वास नहीं हुआ कि एक पढ़ा लिखा सम्मानित डाक्टर और भविष्यवाणी , अजीब उहापोह की स्थिति में मैंने अटैचमेंट खोला , प्रेडिक्शन की पहली लाइन थी 
 I knew you would open this email on Thursday, 18 February 2010 at exactly 10:33 AM
और यह अटैचमेंट मैंने कंप्यूटर टाइम ठीक १०:३३ ऍम पर ही खोला था !
उसके  बाद थाल्सिमिया टेस्ट कराने का अनुरोध था .....
मेरा डाक्टर साहब से अनुरोध है ...
कि वे तुरंत थाल्सेमिया टेस्ट कराने के लिए, एक टिनी सोफ्टवेयर के जरिये कम्पुटर की घडी की रीडिंग लेकर , अचम्भे  में डाल, टेस्ट जरूर करवाने की सलाह देना बंद करें ! भारतीय कानून ऐसे किसी भी ट्रिक को दिखाकर किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने की इजाज़त नहीं देते ! उनका हॉस्पिटल फ्री ट्रीटमेंट करता है तो भी इस ट्रिक के जरिये वे लोगों को नाजायज प्रभावित करने के दोषी तो हैं ही !
आशा है वे इसका जवाब जरूर देंगे !!           

Wednesday, February 17, 2010

क्या आपने कभी किसी बेसहारा की मदद की है ??

35 वर्षीय प्रवेश झा, अनपढ़ पत्नी और दो बच्चों का पिता, जिसे अक्टूबर २००९ में ही बिकानो प्राइवेट लिमिटेड, लारेंस रोड दिल्ली में ३५००.०० प्रति माह पर नौकरी मिली थी , नयी नौकरी की खुशियाँ दो माह ही मना पाया था कि सिरदर्द की बीमारी का कारण एक खतरनाक 4th स्टेज कैंसर (Glioblostoma )बताया गया, और इस गरीब की सारी खुशियाँ, सारे सपने इस महानगर में की चकाचौंध में बुझ गए हैं ! 
मेरे  एक मित्र ने जब इस असहाय परिवार के बारे में बताया दो दिल हिल गया ! फिर एक बार भगवान् से अपने लिए शक्ति मांग रहा हूँ कि इसकी मदद के लायक बना अगर इस रोती लडकी और दो छोटे बच्चों की आंख का एक आंसू भी पोंछ सका तो मैं अपने आपको अच्छा आदमी मान पाऊंगा !
प्रवेश झा की मदद के लिए पता दे रहा हूँ ...
प्रवेश झा 
C/o Bal Kishan Tanwar
wz 408, Basai Dara pur
Near Kirti Nagar , New Delhi-110015
Ph: 9999864887,9555323916, 9334269989
or 
Satish Saxena 
9811076451 
पुनश्च : इस पोस्ट के प्रकाशित होने के तुरंत बाद  प्रवेश झा के भाई से फ़ोन पर बात होने पर प्रवेश झा के निधन का समाचार मिला  है और इसके साथ ही एक लडकी और उसके दो बच्चे बेसहारा हो गए ....! 



     

Thursday, February 11, 2010

ब्लाग जगत में चलता हुआ एक अघोषित युद्ध - सतीश सक्सेना


ब्लाग जगत में आज कल एक अघोषित युद्ध सा छिड़ा लगता है ,अपना अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए, इस  लड़ाई का अंत क्या होगा कुछ नहीं मालूम मगर हम जैसे निर्गुट मेंबर क्या करें यह समझ नहीं आता ! जो अंदाज़ा हुआ है उसके अनुसार एक तरफ एक मस्त मौला  और फक्कड़ सा इंसान , जिस पर लगातार होते वार देख कर मैं  कभी विस्मित सा होता था और हैरान होता था कि क्या सहनशक्ति पायी है इस भले आदमी नें  और दूसरी तरफ एक बढ़िया दिल  वाला शानदार व्यक्तित्व जिसने बिना किसी  उद्देश्य सैकड़ों नवोदित लडखडाते ब्लागर्स को सहारा दिया और उनकी हिम्मत अफजाई की ! निस्संदेह ये सबके सम्मान के अधिकारी हैं  ! 

आश्चर्य है कि यह ब्लाग जगत ऐसा किसको क्या दे रहा है कि सृजन शीलता छोड़ इनके अनुयायियों ने अपने अपने सेनानायक बनाकर, एक दूसरे के खिलाफ हल्ला बोल रखा है और अगर  जल्द स्थिति न सुलझी तो बात गाली गलोग से भी आगे, अनुयायिओं में  मारपीट तक भी पहुँच सकती है ! और अफ़सोस है कि अधिकतर अनुयायी जवान  प्रतिभाशाली लड़के हैं जिनके दिल में आग भरने का कार्य  कुछ वरिष्ठ मगर पिटे हुए ब्लागर, कर रहे हैं ! 

प्रतिभाशाली नयी पौध को आगे बढ़ाने की जगह उनमें द्वेष भावना विकसित करने का यह प्रयास सर्वाधिक निंदनीय है और जो भी इसके प्रायोजक हैं उनकी भर्त्सना होनी ही चाहिए  ! हिन्दी के उत्थान के नाम पर यह लोग एक जहरीली फसल बोने का कार्य कर रहे हैं जिससे इस भाषा की खुशबू,बढ़ने के वजाय कम ही होगी ! 
मैं उम्मीद करता हूँ  कि कुछ जानकार लोग सामने आकर इस समस्या से अवगत कराने में सार्थक भूमिका अदा करेंगे ! 

ब्लाग जगत कि क्रियायों प्रतिक्रियाओं से, लगातार नियमित संपर्क न रखने के कारण, किंकर्तव्यविमूढ़  सा महसूस कर रहा हूँ  ! आजकल यही नहीं समझ पा रहा हूँ कि मैं जिन्हें बहुत अच्छा रचनाकार और सृजन शील समझ रहा हूँ किस गैंग  के मेम्बर हैं  ! ऐसा लगता है कि जमूरों को अपने से अधिक भीड़ इकट्ठी करते देख मदारी अपना आपा खो रहे हैं !  

Monday, February 8, 2010

दिल्ली ब्लागर मिलन में फोटोग्राफर श्री एम् वर्मा एवं डॉ टी एस दराल ! - सतीश सक्सेना

हंसते चेहरे वाले संजू राजीव तनेजा  माहौल को लगातार खुशगवार बनाये रहे , खुशदीप सहगल का एक  प्रयोग, पोस्ट टाइटिल के साथ अपना नाम लिखना बहुत पसंद आया और धन्यवाद के साथ अपना रहा हूँ !    
पूरी व्यवस्था के दौरान फोटोग्राफी का दायित्व संभाले रहे डॉ टी एस दराल एवं बाद में शामिल होने वाले जज्वाती एम् वर्मा जी तथा युगक्रांति  वाले यशवंत मेहता !! अगर यह महानुभाव अपना कैमरा न लाते तो शायद सबको भली भांति जानने का मौका इतनी आसानी से न मिलता ! पंडित डी के शर्मा "वत्स" अधिकतर शांत स्वभाव  से वक्ताओं को सुनने में ही मग्न रहे !   
"अपनी भाषा संयत हो" पर बोलने बालों में से मेरा ध्यान पद्म सिंह ने सिर्फ एक वाक्य बोल कर ही आकर्षित कर लिया कि इसमें नवजवानों से अधिक भागीदारी बड़ी उम्र के ब्लागर की भी है ! संयत भाषा का उपयोग दोनों ही उम्र के लोग करें तभी शोभा देता है ! स्पष्टवादिता और आत्मविश्वास से भरे इस युवक की ऑंखें बहुत कुछ कहती हैं ...  और नवजवानों में भावुक मिथिलेश दुबे  नीशू  और मुसाफिर से लगने वाले नवजवान नीरज जाट  एवं श्री बी पी सिंह बिना अधिक बोले भी प्रसंशा हासिल करने में कामयाब रहे !


सबसे शांत स्वभाव में बैठे सुनते रहे राज भाटिया सबको , मैंने काफी पहले राज के बारे में कुछ लिखा था ! प्रवासी जीवन जीते हुए भारतीयों का दर्द और अपनी मिटटी से अलग होने का गम कभी महसूस करना हो तो राज भाटिया को पढ़ें . पराया देश में बैठे राज, अपने पुराने संस्कारों को ढूँढ़ते रहते हैं ! प्रवासियों में राज का ब्लाग पराया देश  अपने आप में अनूठा है  !   


अंत में चलते चलते अजय कुमार झा के बारे में , सिर्फ एक बार फ़ोन पर बातचीत करने से ही महसूस हुआ कि एक अच्छे इंसान से मुलाकात होगी ! और यह इंसान वैसा ही मिला ! अजय गहरी सोच समझ, प्रतिभाशाली और हिन्दी ब्लाग जगत को बहुत आगे ले जाने का माद्दा रखने वाले ,जीवट के ब्लागर हैं ! मेरी हार्दिक शुभकामनायें !  

दिल्ली ब्लागर मिलन में राज भाटिया ,खुशदीप के साथ विनीत कुमार को सुनना !-सतीश सक्सेना


                 मैं अगर अपनी पसंद की बात कहूं तो शांत राज भाटिया और अविनाश वाचस्पति के साथ बैठ कर विनीत कुमार को सुनना, सुखकर और आनंद दायक लगा, टीवी मिडिया जैसे विषय पर गहरी पकड़, स्पष्ट अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास, उनकी प्रतिभा को, अन्य लोगों से साफ़ साफ़ अलग कर रही थी !

               मुझे लगता है कि आने वाले समय में विनीत अपनी विशिष्ट जगह बनाने में कामयाब होंगे ! इससे पूर्व, मुझे इनके किसी भी लेख को, पढने का सौभाग्य नहीं मिला था !

खुशदीप सहगल, समाज और हिंदी ब्लाग को बहुत कुछ देंगे, ऐसा मेरा विश्वास है , उनके निष्छल मन को समझ पाना किसी के लिए भी आसान है !

चिकित्सा क्षेत्र के लोग साहित्य,समाज :-) और कला से कम ही वास्ता रखते हैं , मगर अपने व्यस्त समय को भूल , फक्कड़ों और मस्तमौलों के बीच ,पूरी रूचि के और मुस्कान के साथ डॉ टी एस दराल लगातार सबको बांधे रहे ! उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र के बारे में अपने कुछ अमूल्य नुस्खे ब्लॉग जगत को देते रहने का वायदा किया है !

एक बेहतरीन दिल के मालिक विनोद पाण्डेय से पहली बार मिलने पर ऐसा नहीं लगा कि इन्हें पहले से नहीं जनता हूँ , इतनी गहरी आत्मीयता ईश्वर बहुत कम लोगों को ही देते हैं !
क्रमश .....

Sunday, February 7, 2010

दिल्ली ब्लागर मिलन - एक सुखद मुलाकात -1

आज की सुखद मुलाकात के लिए सबसे पहले धन्यवाद अजय कुमार झा को देना चाहता हूँ , जिनके कारण मैं पहली बार कुछ बेहतरीन शख्शियतों से आमने सामने परिचित हो सका !इस बैठक से पहले मन में एक संकोच और कुछ शंकाएं थी, जो इस हंसमुख और सुदर्शन व्यक्तित्व से मिलते ही समाप्त हो गयीं ! वहाँ उपस्थित कुछ साथियों से, मैं पहले से ही परिचित था मगर कुछ से पहली बार मुलाकात हुई, !
                                                    डॉ कविता वाचक्नवी  से यहाँ मिलना एक सुखद आश्चर्य जैसा ही रहा, उनसे मिलने के  लिए आज मैं आजाद भवन सभागार, इन्द्रप्रस्थ एस्टेट जाना चाहता था, जहाँ उन्हें उनके कार्य के लिए "अक्षरम सूचना प्रोद्योगिकी सम्मान" दिया जाना था ! इसके अतिरिक्त ८ वें  अन्तराष्ट्रीय हिंदी उत्सव में वे वेब पत्रकारिता पर  उनको वक्ता के रूप में सुनने की मेरी बेहद इच्छा भी थी ! हिंदी की सेवा में समर्पित, ब्रिटेन में बसी इस विद्वान महिला का इस ब्लागर मिलन में शामिल होना मेरी नज़र में, गौरव का विषय है ! अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने तथाकथित भारतीय संस्कारों के नाम पर हो रही दकियानूसी सोच से बाहर निकालने का आवाहन किया !


सरवत एम् जमाल साहब जैसी संवेदनशील प्रतिभा का भी दिल्ली में मिलने का मैं सोच भी नहीं सकता, बेहद खूबसूरत दिल के मालिक सरवत जमाल साहब अपनी धर्मपत्नी अलका मिश्रा के आदेश पर श्री राज भाटिया को कुछ आयुर्वेदिक दिशा निर्देशन देने हेतु लखनऊ से यहाँ पहुंचे थे ! अलका जी जडी बूटियों पर अपने ज्ञान को हिन्दी जगत में बाँट रहीं हैं , और इस तरह यह दोनों पति पत्नी ग़ज़ल और आयुर्वेद के क्षेत्र में बहुत निस्संदेह सराहनीय कार्य कर रहे हैं !


मसिजीवी और अविनाश वाचस्पति जैसे हिंदी ब्लाग जगत के समर्पित लोगों से ऐसे आयोजनों पर मिलना किसी भी हिंदी प्रेमी के लिए सौभाग्य से कम क्या होगा ! अविनाश वाचस्पति और अजय कुमार झा ने बार बार अनुरोध किये जाने पर भी, किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता लेने हेतु विनम्रता से मना कर देना आज के समय में चर्चा का विषय हो सकता है !३०-३५ लोगों के भोजन की व्यवस्था और चायपान करवाना दिल्ली शहर में आसान बात नहीं है !


....क्रमश:





   
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