कभी मांगे नहीं मिलते ,यहाँ अधिकार, दुनिया में !
फैसलों की घड़ी आये ,तो अपनी समझ से लेना,
मदारी रोज लगवाते हैं, जय जयकार दुनिया में !
किताबें खूब पढ़ डालीं, मगर लिखा नहीं पाया कि
पर्वत भी लिया करते हैं अब, प्रतिकार दुनिया में !
पर्वत भी लिया करते हैं अब, प्रतिकार दुनिया में !
इसी बस्ती में, मानव रूप , कुछ शैतान रहते हैं !
बड़े सज धज सुशोभित रूप में मक्कार दुनिया में !
अधिकतर गिरने वाले घर के, अन्दर ही फिसलते हैं !
तुम्हारे हर कदम पर , ध्यान की दरकार, दुनिया में !



















