कहाँ पे जाके कलम चलाई धत्त तेरे की,
किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,
और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !
सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !
आँख न लगने दी, चौकन्ने थे, ड्यूटी पर
और कहाँ जाकर झपकाई, धत्त तेरे की !
किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,
और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !
सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !
आँख न लगने दी, चौकन्ने थे, ड्यूटी पर
और कहाँ जाकर झपकाई, धत्त तेरे की !
ताल ठोक कर बड़े भयंकर शेर सुनाये
और कभी ना हुई धुनाई, धत्त तेरे की !
कवि बन के हिन्दी की करते ऎसी तैसी
पुरस्कार की हाथा पाई , धत्त तेरे की !
बने मसखरे उपाध्यक्ष अब अकादमी के !
कैसी समझ आप को आई,धत्त तेरे की !
और कभी ना हुई धुनाई, धत्त तेरे की !
कवि बन के हिन्दी की करते ऎसी तैसी
पुरस्कार की हाथा पाई , धत्त तेरे की !
बने मसखरे उपाध्यक्ष अब अकादमी के !
कैसी समझ आप को आई,धत्त तेरे की !













